Friday, January 17, 2014

हमरु सुरिलू उत्तराखंड...


ईदगा उद्गा नी केर भेजी
हम ता पहाडा का लोग छो
शहर मा ऐकि हमत
अपनु पहाड़ थेकि भूली गयों
हवा पाणी ऊ मस्ती मौज
खेत, श्यारा और
गोर बकरों की खोज
सुच्दा हवाला हम किद्गा
यख कमाना छों
कैल जाणी हमर दिल की
हम किद्गा पछताना छो
ये पुटुक की खातिर हमल
सब घर बार छोड़याली
अब मन मा उठाना छीन
फिर भांड्य रणा सवाल
याद जरुर कर्दों हम
ऊँ ऊँचा निचा डांडों थे
बिसर नी सकदा हम
ऊँ टेढ़ा मेढ़ा बांटों थे
किले हम करना छो
यख अपनी दुर्गत
हुम्थेकि याद कर्नुचा
हमरु गौं चुरगढ़
आज चल जोंला
या भोल पर्बात
बस यी सोची की
कटना छीन दिन रात
यख ता हर कदम ब्स्युन चा
गुसा, द्वेष अर घमंड
हुम्थेकि प्यारु चा
हमरु सुरिलू उत्तराखंड 

                                संदीप सिंह रावत (पागल)

ये ख़त कहलाया जाता है





एक मैं हूँ अब
की कोई याद नही करता
एक दिन था
जब हर कोई मुझ पर
था मरता
दूरियों को मिटाना
रोतों को हसाना
सब मुझ बिन कहाँ मुमकिन था
भोर होती तो डाकिया आता था
हर घर मैं मेला सा लग जाता था
कहीं किसी का आना
कहीं किसी का जाना था
सबको ये ख़बरें
मेरा काम पहुँचाना था
फौजी जो शरहद पर
और परिवार घर पर रोते थे
उनके आंसुओ से
मैं ही भिगोया जाता था
पर मेरी कोन यहाँ  
व्यथा है आज सुनने वाला
हाँ मालूम है
सबका वक़्त
एक दिन ढल जाना है
जामना नया है
और मेरा काम पुराना है  
तब मैं जो करता था
अब वो छुटकू कर जाता है
मैं दिन लगाता था
और वो पल लगाता है
और कहाँ कोई अब मेरे
झंझट में पड़ना चाहता है
पर अगर मैं जिन्दा हूँ
तो अहसास कहाँ मर जाता है
और अगर मैं मुर्दा हूँ
तो क्यूँ दफनाया नही जाता है
कोई कब्र तो होती
जो बच्चे देख कर पूछते.. क्या है ?
और जानते की हाँ  
ये ख़त कहलाया जाता है
मेरे लिए तो
दुविधा है
दुःख है
पर रो भी पाना
नामुमकिन है
मेरा तो आंसू भी
मेरी मौत बन जाता है

                                        संदीप सिंह रावत (पागल)

Friday, January 10, 2014

रोना है

                                                                                  










हाँ फिर बचपन की निंदिया में सोना है
उन् अधूरे ख्वाबों में खोना है
रात को तारो संग बतियाना है
इस दुनिया से मुझे दूर जाना है
ये आशियाना शायद मुझे नही भाता
जो सब सुनना चाहें वो गीत मुझे नही आता
ऊँची कद की है ये दुनिया 
मै कहाँ एक निरर्थक बोना
सपनो का संसार बनाया 
उसमे ना थी कोई मोह माया 
ना जाने किस की घ्रण मंशा थी
मैंने वो घरोंदा गंवाया 
हाँ मुझको फिर निर्भय निडर होना है
हर मंजिल पा सफल होना है
पर खोफ ये भगाया जाता नही है
मुझे कुछ पल को तनहा होना है
हाँ मुझको जी भर रोना है !

                                                         संदीप सिंह रावत (पागल)

Wednesday, June 19, 2013

वृक्षारोपण
















 

शीतल पावन गंगा ने ये कैसा उत्पात किया
अपने ही भक्तो पर असहनीय आघात किया

सब की जुबान पर बस यही शब्द हैं गूंज रहे
कितनी हानि हुई कितने लोग गंगा में बहे

दर्द हुआ दुःख हुआ और होना भी लाजमी ही था
अपने खोये सपने खोये वो भयावह मंजर था

कोष रहे सब वर्षा को कभी गंगा को आखिर क्यूँ ?
जब ये प्रलय तो खुद ही पुकारी है

ये कहर नही बस चेतना है जो अब सबको समझानी है
जो दर्द मिला है धरती को ये तो उसका भुक्तान है

वृक्ष कटे और उनकी जगह इमारतों का आवाहन हुआ
प्रकोप है ये की गंगा तट अब कैसे शमशान हुआ

जो हुआ वो तो अब बदला जाना मुमकिन ना होगा
उम्मीद है हम ये कह सकें की फिर ऐसा कभी ना होगा

दोष हमारा अब खुद हर्जाना भरना है
कसम खाओ अब वृक्षारोपण करना है 

                                                                  संदीप सिंह रावत (पागल)